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  • Co-ordinator 9:29 pm on December 18, 2011 Permalink | Reply
    Tags: अदम गोंडवी   

    गरम रोटी की महक पागल बना देती मुझे 

    - दयानंद पांडेय

    अदम गोंडवी आज सुबह क्या गए लगता है हिंदी कविता की सुबह का अवसान हो गया।
    हिंदी कविता में नकली उजाला, नकली अंधेरा, बिंब, प्रतीक, फूल, पत्ती, चिडिया, गौरैया, प्रकृति, पहाड आदि देखने- बटोरने और बेचने वाले तो तमाम मिल जाएंगे पर वह मटमैली दुनिया की बातें बेलागी और बेबाकी के साथ करने वाले अदम को अब कहां पाएंगे? कबीर सा वह बांकपन, धूमिल सा वह मुहावरा, और दुष्यंत सा वह टटकापन सब कुछ एक साथ वह सहेजते थे और लिखते थे – गर्म रोटी की महक पागल बना देती मुझे/पारलौकिक प्यार का मधुमास लेकर क्या करें। अब कौन लिखेगा- जो डलहौजी न कर पाया वो ये हुक्काम कर देंगे/ कमीशन दो तो हिंदुस्तान को नीलाम कर देंगे। या फिर काजू भुनी प्लेट मे ह्विस्की गिलास में/ उतरा है रामराज विधायक निवास में। या फिर, जितने हरामखोर थे कुर्बो-जवार में/ परधान बन के आ गए अगली कतार में।

    गुज़रे सोमवार जब वह आए तभी उन की हालत देख कर अंदाज़ा हो गया था कि बचना उन का नमुमकिन है। तो भी इतनी जल्दी गुज़र जाएंगे हमारे बीच से वह यह अंदाज़ा नहीं था।

    वह तो कहते थे यूं समझिए द्रौपदी की चीर है मेरी गज़ल में। और जो वह एशियाई हुस्न की तसवीर लिए अपनी गज़लों में घूमते थे और कहते थे कि, आप आएं तो कभी गांव की चौपालों में/ मैं रहूं न रहूं भूख मेज़बां होगी। और जिस सादगी से, जिस बुलंदी और जिस टटकेपन के ताव में कहते थे, जिस निश्छलता और जिस अबोधपन को जीते थे कविता और जीवन दोनों में अब वह दुर्लभ है। तुम्हारी फ़ाइलों में गांव का मौसम गुलाबी है/ मगर ये आंकडे झूठे हैं ये दावा किताबी है। या फिर ज़ुल्फ़-अंगडाई-तबस्सुम-चांद-आइना-गुलाब/भुखमरी के मोर्चे पर ढल गया इन का शबाब। उनके शेरों की ताकत देखिए और फिर उनकी सादगी भी। देखता हूं कि लोग दू ठो कविता, दू ठो कहानी या अलोचना लिख कर जिस अहंकार के सागर में कूद जाते हैं और फ़तवेबाज़ी में महारत हासिल कर लेते हैं इस बेशर्मी से कि पूछिए मत देख कर उबकाई आती है। पर अदम इस सब से कोसों दूर ठेंठ गंवई अंदाज़ में धोती खुंटियाये ऐसे खडे हो जाते थे कि उन पर प्यार आ जाता था। मन आदर और श्रद्धा से भर जाता था। और वो जो शमशेर कहते थे कि बात बोलेगी/ हम नहीं/ भेद खोलेगी आप ही को साकार करते जब उन की गज़लें बोलती थी और प्याज की परत दर परत भेद खोलती थीं, व्यवस्था और समाज की तो लोग विभोर हो जाते थे। हम जैसे लोग न्यौछावर हो जाते थे। अदम मोटा पहनते ज़रुर थे पर बात बहुत महीन करते थे। उन के शेर जैसे व्यवस्था और समाज के खोखलेपन और दोहरेपन पर तेज़ाब डालते थे। वह उन में से नहीं थे कि कांख भी छुपी रहे और मुट्ठी भी तनी रहे। वह तो जब मुट्ठी तानते थे तो उन की कांख भी दीखती ही थी। वह वैसे ही नहीं कहते थे कि – वर्गे-गुल की शक्ल में शमशीर है मेरी गज़ल। तो गज़ल को जामो मीना से निकाल कर शमशीर की शक्ल देना और कहीं उस पर पूरी धार चढा कर पूरी ताकत से वार भी करना किसी को जो सीखना हो तो अदम से सीखे। हां वह व्यवस्था से अब इतना उकता गए थे कि उन की गज़लों में भूख और लाचारी के साथ साथ नक्सलवाद की पैरवी भी खुले आम थी। उन का एक शेर है- ये नई पीढी पे मबनी है वही जजमेंट दे/ फ़लसफ़ा गांधी का मौजू है के नक्सलवाद है। वह यहीं नहीं रुके और लिख गए कि -लगी है होड सी देखो अमीरों और गरीबों में/ ये गांधीवाद के ढांचे की बुनियादी खराबी है/ तुम्हारी मेज़ चांदी की तुम्हारे जाम सोने के/ यहां जुम्मन के घर में आज भी फूटी रकाबी है।

    अदम के पास अगर कुछ था तो बेबाक गज़लों की जागीर ही थी। और वही जागीर वह हम सब के लिए छोड गए हैं। और बता गए हैं कि – घर में ठंडे चूल्हे पर अगर खाली पतीली है/ बताओ कैसे लिख दूं धूप फागुन की नशीली है। वह तो बता गए हैं – भीख का ले कर कटोरा चांद पर जाने की ज़िद / ये अदा ये बांकपन ये लंतरानी देखिए/ मुल्क जाए भाड में इससे इन्हें मतलब नहीं/ कुर्सी से चिपटे हुए हैं जांफ़िसानी देखिए। वह बताते भी थे कि अदम के साथ गमों की बरात होती है। तो लोग ज़रा नहीं पूरा बिदक जाते थे। घुटनों तक धोती उठाए वह निपट किसान लगते भी थे। पर जब कवि सम्मेलनों में वह ठेंठ गंवई अंदाज़ में खडे होते थे तो वो जो कहते हैं कि कवि सम्मेलन हो या मुशायरा लूट ले जाते थे। पर यह एक स्थिति थी। ज़मीनी हकीकत एक और थी कि कवि सम्मेलनों और मुशायरों में उन्हें वाहवाही भले सब से ज़्यादा मिलती थी, मानदेय कहिए, पारिश्रमिक कहिए उन्हें सब से कम मिलता था। लतीफ़ेबाज़ और गलेबाज़ हज़ारों में लेते थे पर अदम को कुछ सौ या मार्गव्यय ही नसीब होता था। वह कभी किसी से इस की शिकायत भी नहीं करते थे। रोड्वेज की बस या रेलगाडी के जनरल डब्बे में सवारी बन कर चलना उन की आदत थी। वह आम आदमी की बात सिर्फ़ कहते भर नहीं, आम आदमी बन कर रहते जीते भी थे। उन के पांव की बिवाइयां इस बात की बराबर चुगली भी खाती थीं। वह वैसे ही नहीं लिख गए कि, भूख के अहसास को शेरो सुखन तक ले चलो/ या अदब को मुफ़लिसों की अंजुमन तक ले चलो/ जो गज़ल माशूक के जलवों से वाकिफ़ हो गई/ उसको अब बेवा के माथे की शिकन तक ले चलो। और वह बेवा की माथे की शिकन से और आगे भी गज़ल को ले भी आए इस बात का हिंदी जगत को फख्र होना चाहिए। उन की शुरुआत ही हुई थी चमारों की गली से। कि, आइए, महसूस करिए ज़िंदगी के ताप को/ मैं चमारो की गली तक ले चलूंगा आप को। इसी कविता ने अदम को पहचान दी फिर काजू भुनी प्लेट में ह्विस्की गिलास में/ उतरा है रामराज विधायक निवास में शेर ने उन्हें दुनिया भर में परिचित करवा दिया। उन की तूती बोलने लगी। फिर तो वह हिंदी गज़ल की मुकम्मल पहचान बन गए। उर्दू वालों ने भी उन्हें सिर माथे बिठाया और उन की तुलना मज़ाज़ से होने लगी। समय से मुठभेड नाम से जब उन का संग्रह आया तो सोचिए कि कैफ़ भोपाली ने लंबी भूमिका हिंदी में लिखी और उन्हें फ़िराक, जोश और मज़ाज़ के बराबर बिठाया। हिंदी और उर्दू दोनों में उन के कद्रदान बहुतेरे हो गए। तो भी अदम असल में खेमे और खाने में भी कभी नहीं रहे। लोग लोकप्रिय होते हैं वह जनप्रिय थे, जनवाद की गज़ल गुनगुनाने और जनवाद ही को जीने ओढने और बिछाने वाले। यह अनायास नहीं था कि उन के पास इलाज के लिए न पैसे थे न लोगबाग। कभी मुलायम सिंह के जन्म दिन पर आयोजित होने वाले कवि सम् के साथ साथ मुलायम भी उन की सादी और बेबाक गज़लों पर रीझ जाते थे। तो मुलायम उन्हें भूले नहीं। अब की जब वह बीमार पडे तो न सिर्फ़ सब से पहले उन्हों ने इलाज खर्च के लिए हाथ बढाया बल्कि आज सुबह जब पांच बजे उन के निधन की खबर आई तो आठ बजे ही मुलायम सिंह पी जी आई पहुंच भी गए।बसपा की रैली की झंझट के बावजूद। न सिर्फ़ पहुंचे उन का पार्थिव शरीर गोंडा में उन के पैतृक गांव भिजवाने के लिए सारा प्रबंध भी करवाया। लखनऊ से गोंडा तक रास्ते भर लोगों ने उन का पार्थिव शरीर रोक रोक कर उन्हें श्रद्धांजलि दी। लखनऊ में भी बहुतेरे लेखक और संस्कृतिकर्मियों समाजसेवियों ने उन्हें पालिटेक्निक चौराहे पर श्रद्धांजलि दी। उन के एक भतीजे को पानीपत से आना है। सो अंत्येष्टि कल होगी।

    अदम अब नहीं हैं पर कर्जे में डूब कर गए हैं। तीन लाख से अधिक का कर्ज़ है। किसान सोसाइटी से डेढ लाख लिए थे अब सूद लग कर तीन लाख हो गए हैं। रिकवरी को ले कर उन के साथ बदतमीजी हो चुकी है। ज़मीन उन के गांव के दबंगों ने दबा रखी है। है कोई उन के जाने के बाद भी उन के परिवारीजनों को इस सब से मुक्ति दिलाने वाला? एक बात और। अदम गोंडवी का निधन लीवर सिरोसिस से हुआ है। यह सभी जानते हैं। पर यह लीवर सीरोसिस उन्हें कैसे हुई कम लोग जानते हैं। वह ट्रेन से दिल्ली से आ रहे थे कि रास्ते में उन के साथ जहर खुरानी हो गई। वह होश में तो आए पर लीवर डैमेज कर के। जाने क्या चीज़ जहरखुरानों ने उन्हें खिला दी। पर अब जब वह बीमार हो कर आए तो उन की मयकशी ही चरचा में रही। यह भी खेदजनक था। उन के ही एक मिसरे में कहूं तो आंख पर पट्टी रहे और अक्ल पर ताला रहे। तो कोई कुछ भी नहीं कर सकता। उन के एक शेर में ही बात खत्म करुं कि, एक जनसेवक को दुनिया में अदम क्या चाहिए/ चार छै चमचे रहें माइक रहे माला रहे। अब यह बात हर हलके में शुमार है अदम गोंडवी, यह भी आप जान कर ही गए होंगे। पर क्या कीजिएगा भारत भूषण का एक गीत है कि ये असंगति ज़िंदगी के साथ बार बार रोई/ चाह में और कोई/ बांह में और कोई! तो अदम के पास गज़लें थीं, शोहरत थी पर दौलत नहीं थी। उन का जीवन कुछ इस तरह बीता कि इक हाथ में कलम है और एक हाथ में कुदाल/ वाबस्ता हैं ज़मीन से सपने अदीब के। आमीन अदम गोंडवी, एक बार फिर आमीन ! हां गीतों की राजकुमार भारत भूषण का भी कल रात मेरठ के एक अस्पताल में निधन हो गया। इन दोनों रचनाकारों को हमारी विनम्र श्रद्धांजलि !


    दयानंद पांडेय
    5/7 डालीबाग, लखनऊ
    09335233424
    09415130127
    dayanand.pandey@yahoo.com

     
  • Co-ordinator 2:18 pm on June 19, 2011 Permalink | Reply
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    चलना जीवन की कहानी रुकना मौत की निशानी 

    – दयानंद पांडेय

    एक सार्थक और प्रेरक जिंदगी जी है अरविंद कुमार ने

    रचनात्मकता आदमी को कैसे युवा बनाए रखती है इस बात को देखना-परखना हो तो अरविंद कुमार से मिलिए. अब जब अरविंद कुमार को हिंदी अकादमी दिल्ली ने शलाका सम्मान से विभूषित किया है तो उन्हें याद आते हैं 1945 से शुरू होते कुछ दिन. जनवरी में वह पंद्रह साल के हुए थे, मैट्रिक की परीक्षा में बैठ चुके थे, अंतिम पर्चा 26 मार्च को हुआ था और पहली अप्रैल से ही सरिता के प्रकाशकों के दिल्ली प्रेस में बतौर कंपोजीटर-डिस्ट्रीब्यूटर काम करने लगे थे. साथ-साथ आजादी की लड़ाई में तरुण सैनिक की तरह दिल्ली के करोल बाग उपनगर में पूरी तरह सक्रिय थे. और कांग्रेस सेवादल के साथ साथ जुझारू लाल किला ग्रुप के सदस्य थे. जिन दिनों महात्मा गांधी नई दिल्ली की भंगी कालोनी (आजकल हरिजन बस्ती) में रहते थे, तो पूरे एक महीने वहां स्वयंसेवक के रूप में उपस्थित रहे थे. आज़ादी के लिए ब्रिटिश सरकार से जो बातचीत चल रही थी, उस पर विचार विमर्श करने के लिए पंडित नेहरू, मौलाना आज़ाद, सरदार पटेल जैसे नेता वहां गांधी जी से मिलने आते-जाते रहते थे.

    जीवन का महामंत्र

    15 अगस्त को पहले स्वाधीनता दिवस पर लाल किले से पंडित नेहरू का ओजस्वी भाषण सुनने अरविंद कुमार भारी भीड़ में मौजूद थे. पंडित जी ने भारत के प्राचीन गौरव का वर्णन करते भविष्य का जो खाका बुना वह अब तक अरविंद के कानों में गूंजता है. उन के सभी मित्रों के सामने सवाल था आज़ाद हिंदुस्तान में देशभक्ति का मतलब क्या? अरविंद कुमार का मानना था कि अब वही आदमी देशभक्त माना जाना चाहिए जो अपना हर काम मेहनत से, पूरी तनदेही से, ईमानदारी से करे और निजी विकास कर के देश को आगे बढ़ाए. कोरी नारेबाजी को नए दौर में देशभक्ति नहीं कहा जा सकता.बस यह उन्हों ने अपने जीवन का महामंत्र बना लिया. 1948 आते-आते दिन भर प्रेस में नौकरी के बाद शाम के समय आगे की पढ़ाई शुरू कर दी. मैट्रिक में उन्हें चार विषयों में डिस्टिंक्शन मिला था. 1956 तक शाम को चलने वाले पंजाब विश्वविद्यालय के ईविंग कॉलेज से इंग्लिश लिटरेचर में एम.ए. कर लिया. तब तक वह दिल्ली प्रेस में पहले प्रूफ रीडर, फिर उप संपादक सरिता, बाद में उप संपादक (इंग्लिश) कैरेवान बन चुके थे. फिर धीरे-धीरे वहां की सभी पत्रिकाओं के प्रभारी सहायक संपादक बन गए थे.

    इसी बीच 1953 में उन का परिचय हुआ इंग्लिश के पहले थिसारस से. ठीक 101 साल पहले लंदन में इस ऐतिहासिक कोश की रचना फ्रांसीसी मूल के वैज्ञानिक और भाषा-प्रेमी रोजेट ने की थी. यह किताब क्या देखी, अरविंद जी दीवाने हो गए. दिन-रात अपने पास रखते, जब-तब पन्ने पलटते, शब्दों के अनमोल भंडार में विचरते, इंग्लिश की शब्दशक्ति बढ़ाते रहते… और सोचते चाहते रहते कि हिंदी में भी कोई ऐसा कोश हो तो क्या हो! वाह हो! हिंदी का भला हो, हिंदी आगे बढ़े, तेजी से बढ़े. 23 साल की उमर के अरविंद यह सोच ही नहीं सकते थे कि इस के 43 साल बाद आज़ादी का पचासवां साल आते-आते उन्हीं के हाथ का बना हिंदी का पहला थिसारस छपेगा और उसकी पहली प्रति वह स्वयं और उन की पत्नी कुसुम भारत के राष्ट्रपति को भेंट करेंगे. अपनी देशभक्ति और हिंदी प्रेम का साकार प्रमाण पेश करेंगे. वह तो बस यही सोचते थे कि भारत सरकार ने हिंदी कोशकारिता के लिए इतने सारे आयोग बनाए हैं. वहां से कभी न कभी हिंदी का थिसारस भी आएगा ही.

    लेकिन यहां तक का सफर कोई आसान सफर नहीं था. वह जो सपना था, 1973 के दिसंबर की 26-27 तारीख तक सपना ही बना रहा था. इस बीच वह सरिता कैरेवान छोड़ कर मुंबई (तब बंबई) से टाइम्स आफ इंडिया के लिए फिल्म पत्रिका माधुरी का संपादन करने पहुंच चुके थे (नवंबर 1963). तब वह हिंदी के डाक्टर धर्मवीर भारती, महावीर अधिकारी, चंद्रगुप्त विद्यालंकार और आनंदप्रकाश जैन और इंग्लिश के शामनाथ, डाक्टर रांगणेकर, खुशवंत सिंह और बी.के. करंजिया जैसे संपादकों के बीच टाइम्स संस्थान के सब से कम उम्र के संपादक थे. उन्होंने माधुरी को सस्ती स्टार-क्रेजी फिल्म पत्रकारिता से दूर रखा था, हिंदी में कलात्मक और सुरुचिपूर्ण फिल्मों को प्रोत्साहन देने के लिए समांतर सिनेमा आंदोलन की मुखपत्रिका बना दिया.

    माधुरी के संपादन के आरंभिक काल में ही उन्हें गीतकार शैलेंद्र, निर्माता-निर्देशक राज कपूर, देव आनंद, बी. आर. चोपड़ा, शक्ति सामंत, मृणाल सेन, संगीतकार नौशाद, खय्याम, जयदेव, शंकर जयकिशन जैसे दिग्गजों से फिल्म कला के बारे में जानने को बहुत कुछ मिला. लेकिन 1973 तक आते-आते उन्हें लगने लगा था कि वह कोरे फिल्म पत्रकार बनने के लिए नहीं जनमे हैं. उन्हें तो अपना कुछ ऐसा करना है जिस के लिए वह पैदा हुए हैं, जो उन का अपना निजी सपना हो.

    सपना तेरा है तू ही साकार कर

    तभी दिसंबर 26-27 की रात उन्हें याद आया वह रोजेट का थिसारस और उस जैसी कोई किताब हिंदी में होने की आकांक्षा. तब रात के अंधेरे में किसी ने उन से कहा, “सपना तेरा था, तो कोई दूसरा क्यों साकार करेगा. तुझे ही यह करना है, तू ही हिंदी को थिसारस दे.” और 27 की सुबह हैंगिंग गार्डन में सैर के समय अरविंद और कुसुम ने तय कर लिया कि वही यह कोश बनाएंगे. कहीं से कैसी भी आर्थिक सहायता की संभावना नहीं थी. तय किया कि फिलहाल शाम के सुबह और समय मुंबई में ही घर पर काम करें, किफायती जीवन जी कर बचत बढ़ाएं और 1978 की मई तक माधुरी छोड़ कर दिल्ली अपने घर चले जाएं. उस दिन से जीवन को नई राह मिल गई.

    1978 में वह मुंबई फिल्म पत्रकारिता में शीर्ष पर थे. मायानगरी की मोहमाया छोड़ कर दिल्ली चले आए. पर मुसीबतें तो अभी शुरू होनी थीं. सितंबर में माडल टाउन को यमुना की बाढ़ ने घेर लिया. मुंबई से लाया सब साज सामान पानी की भेंट चढ़ गया. कुछ बचा तो बचे थे समांतर कोश के कार्ड… भूत काल बहा ले गई थी, यमुना भविष्य को सुरक्षित छोड़ गई थी.

    तभी दूसरी मुसीबत आई. पिताजी ने बाढ़ से परेशान हो कर वह मकान सस्ते में बेच दिया. अब गाजियाबाद के सूर्यनगर-चंद्रनगर इलाके में आए. जो बचत थी वह सब हवा हो गई. रीडर्स डाइजेस्ट का हिंदी संस्करण सर्वोत्तम निकालने की जिम्मेदारी लेनी पड़ी. लेकिन वहां कुल पांच साल (1980-1985) काम किया. आर्थिक दशा कामचलाऊ होते ही सर्वोत्तम छोड़ दिया और समांतर कोश के काम में पूरी तरह लग गए.

    और तब 1989 में दिल का भारी दौरा पड़ा. सफल आपरेशन हुआ. कुछ दिन बाद ही जांडिस ने घेर लिया. उस से निकल कर फिर पति-पत्नी दिन रात समांतर कोश पर काम करने लगे. बेटे डॉक्टर सुमीत ने सुझाव दिया और इस के लिए आर्थिक संसाधन जुटाए कि सारा काम कंप्यूटर पर किया जाए. 63 साल के अरविंद ने कंप्यूटर पर काम शुरू किया. पुराना डाटा किसी से फीड करवाया. नया डाटा अपने आप जोड़ा.

    जो काम कुल दो साल में पूरा करने का अनुमान था, वह बड़ी जद्दोजहद के बाद 23 साल बाद 1996 में पूरा हुआ. और नेशनल बुक ट्रस्ट ने स्वाधीनता के पचासवें वर्ष की पुस्तकों में सम्मिलित करते हुए प्रकाशित किया.

    पर अरविंद का काम अभी खत्म नहीं हुआ था. अब उस डाटा में इंग्लिश डालने की धुन सवार हुई. दस साल की मेहनत के बाद स्वाधीनता के साठवें वर्ष में विश्व का तीन खंडों वाला विशालतम द्विभाषी थिसारस द पेंगुइन इंग्लिश-हिंदी-हिंदी-इंग्लिश थिसारस ऐंड डिक्शनरी प्रकाशित हुआ.

    और अब अरविंद कुमार ने 1947 के देशभक्ति के अपने मूल मंत्र का पालन करते हुए बनाया है इंटरनेट पर जारी होने वाला अनोखा अरविंद लैक्सिकन. लैक्सिकन के विशाल शब्द महा सागर में 9,00,000 से ज़्यादा इंग्लिश और हिंदी अभिव्यक्तियां हैं. माउस से क्लिक कीजिए – पूरा रत्नभंडार खुल जाएगा… उदाहरण के लिए सुंदर शब्द के इंग्लिश में 200 से और हिंदी में 500 से ज़्यादा पर्याय हैं. यह 15 अगस्त 2011 से राष्ट्र ही नहीं दुनिया भर के भाषा-प्रेमियों को उपलब्ध होगा.

    इस के बाद अरविंद निष्क्रिय बैठने वाले नहीं हैं. अब वह इस में तमिल और चीनी भाषाएँ जोड़ने की योजना बना रहे हैं. उन का कहना है चलना जीवन की कहानी रुकना मौत की निशानी.

    चित्र परिचय – तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. शंकर दयाल शर्मा को समांतर कोश की पहली प्रति भेंट करते अरविंद कुमार दंपति. 13 दिसंबर 1996. यह अरविंद कुमार की पहली प्रकाशित पुस्तक थी. तब अरविंद 66वां वर्ष पूरा कर रहे थे.


    लेखक संपर्क :

    दयानंद पांडेय
    5/7 डालीबाग़, लखनऊ
    09335233424
    09415130127
    ई-मेल: dayanand.pandey@yahoo.com

     
  • Co-ordinator 7:54 pm on June 18, 2011 Permalink | Reply
    Tags: , शलाका सम्मान   

    अरविंद कुमार: बाल श्रमिक से शब्दाचार्य तक की यात्रा 

    – दयानंद पांडेय

    (हिंदी अकादमी शलाका सम्मान से सम्मानित अरविंद कुमार पर विशेष)

    हम नींव के पत्थर हैं तराशे नहीं जाते. सचमुच अरविंद कुमार नाम की धूम हिंदी जगत में उस तरह नहीं है जिस तरह होनी चाहिए. लेकिन काम उन्होंने कई बड़े-बड़े किए हैं. हिंदी जगत के लोगों को उन का कृतज्ञ होना चाहिए. दरअसल अरविंद कुमार ने हिंदी थिसारस की रचना कर हिंदी को जो मान दिलाया है, विश्व की श्रेष्ठ भाषाओं के समकक्ष ला कर खड़ा किया है, वह न सिर्फ़ अद्भुत है बल्कि स्तुत्य भी है. कमलेश्वर उन्हें शब्दाचार्य कहते थे. हिंदी अकादमी, दिल्ली ने हिंदी भाषा और साहित्य के विकास में महत्वपूर्ण योगदान के लिए वर्ष 2010-2011 की हिंदी अकादमी शलाका सम्मान से सम्मानित करने का जो निर्णय आज लिया है, वास्तव में यह बहुत पहले ले लिया जाना चाहिए था.

    अरविंद कुमार ने 81 वर्ष की उम्र के इस पड़ाव पर भी खामोशी अख्तियार नहीं की है. वह लगातार काम पर काम किए जा रहे हैं. नया काम उनका अरविंद लैक्सिकन है. आजकल हर कोई कंप्यूटर पर काम कर रहा है. किसी के पास न तो इतना समय है न धैर्य कि कोश या थिसारस के भारी भरकम पोथों के पन्ने पलटे. आज चाहिए कुछ ऐसा जो कंप्यूटर पर हो या इंटरनेट पर. अभी तक उनकी सहायता के लिए कंप्यूटर पर कोई हैंडी और तात्कालिक भाषाई उपकरण या टूल नहीं था. अरविंद कुमार ने यह दुविधा भी दूर कर दी है. अरविंद लैक्सिकन दे कर. यह ई-कोश हर किसी का समय बचाने के काम आएगा. अरविंद लैक्सिकन पर 6 लाख से ज्यादा अंगरेज़ी और हिंदी अभिव्यक्तियां हैं. माउस से क्लिक कीजिए – पूरा रत्नभंडार खुल जाएगा. किसी भी एक शब्द के लिए अरविंद लैक्सिकन इंग्लिश और हिंदी पर्याय, सपर्याय और विपर्याय देता है, साथ ही देता है परिभाषा, उदाहरण, संबद्ध और विपरीतार्थी कोटियों के लिंक. उदाहरण के लिए सुंदर शब्द के इंग्लिश में 200 और हिंदी में 500 से ज्यादा पर्याय हैं. किसी एकल इंग्लिश ई-कोश के पास भी इतना विशाल डाटाबेस नहीं है. लेकिन अरविंद लैक्सिकन का सॉफ्टवेयर बड़ी आसानी से शब्द कोश, थिसारस और मिनी ऐनसाइक्लोपीडिया बन जाता है. इसका पूरा डाटाबेस अंतर्सांस्कृतिक है, अनेक सभ्यताओं के सामान्य ज्ञान की रचना करता है. शब्दों की खोज इंग्लिश, हिंदी और रोमन हिंदी के माध्यम से की जा सकती है. रोमन लिपि उन सब को हिंदी सुलभ करा देती है जो देवनागरी नहीं पढ़ सकते या टाइप नहीं कर सकते.

    अरविंद लैक्सिकन को माइक्रोसॉफ्ट ऑफिस के साथ-साथ ओपन ऑफ़िस में पिरोया गया है. इसका मतलब है कि आप इनमें से किसी भी एप्लीकेशन में अपने डॉक्यूमेंट पर काम कर सकते हैं. सुखद यह है कि दिल्ली सरकार के सचिवालय ने अरविंद लैक्सिकन को पूरी तरह उपयोग में ले लिया है.

    अरविंद कहते हैं कि शब्द मनुष्य की सबसे बड़ी उपलब्धि है, प्रगति के साधन और ज्ञान-विज्ञान के भंडार हैं, शब्दों की शक्ति अनंत है. वह संस्कृत के महान व्याकरणिक महर्षि पतंजलि को कोट करते हैं, ‘सही तरह समझे और इस्तेमाल किए गए शब्द इच्छाओं की पूर्ति का साधन हैं.’ वह मार्क ट्वेन को भी कोट करते हैं, ‘सही शब्द और लगभग सही शब्द में वही अंतर है जो बिजली की चकाचौंध और जुगनू की टिमटिमाहट में होता है.’ वह बताते हैं, ‘यह जो सही शब्द है और इस सही शब्द की ही हमें अकसर तलाश रहती है.’

    दरअसल इसके लिए भाषाई उपकरण बनाने का काम भारत में हजारों साल पहले ही शुरू हो गया था. जब प्रजापति कश्यप ने वैदिक शब्दों का संकलन ‘निघंटु’ बनाया और बाद में महर्षि यास्क ने संसार का सब से पहला ऐनसाइक्यलोपीडिक कोश ‘निरुक्त’ बनाया. इसे पराकाष्ठा पर पहुंचाया छठी-सातवीं शताब्दी में अमर सिंह ने ‘अमर कोश’ के द्वारा. और 1996 में जब समांतर कोश नाम से हिंदी थिसारस नेशनल बुक ट्रस्ट ने प्रकाशित किया तो हिंदी में बहुतेरे लोगों की आंखें फैल गईं. क्यों कि हिंदी में बहुत सारे लोग थिसारस के कंसेप्ट से ही वाकिफ़ नहीं थे. और अरविंद कुमार चर्चा में आ गए थे. वह फिर चर्चा में आए हिंदी-अंगरेज़ी थिसारस तथा अंगरेज़ी-हिंदी थिसारस और भारत के लिए बिलकुल अपना अंगरेज़ी थिसारस के लिए. इसे पेंग्विन ने छापा था. अब वह फिर चर्चा में हैं अरविंद लैक्सिन तथा हिंदी अकादमी शलाका सम्मान से सम्मानित हो कर.

    उम्र के 81वें वसंत में अरविंद कुमार इन दिनों कभी अपने बेटे डॉक्टर सुमीत के साथ पांडिचेरी में रहते हैं तो कभी गाज़ियाबाद में. इन दिनों वह गाज़ियाबाद में हैं. अरविंद कुमार को कड़ी मेहनत करते देखना हैरतअंगेज ही है. सुबह 5 बजे वह कंप्यूटर पर बैठ जाते हैं. बीच में नाश्ता, खाना और दोपहर में थोड़ी देर आराम के अलावा वह रात तक कंप्यूटर पर जमे रहते हैं. उम्र के इस मोड़ पर इतनी कड़ी मेहनत लगभग दुश्वार है. लेकिन अरविंद कुमार पत्नी कुसुम कुमार के साथ यह काम कर रहे हैं. समांतर कोश पर तो वह पिछले 35-36 सालों से लगे हुए थे. अरविंद हमेशा कुछ श्रेष्ठ करने की फ़िराक़ में रहते हैं. एक समय टाइम्स ऑफ़ इंडिया ग्रुप से प्रकाशित फ़िल्म पत्रिका माधुरी के न सिर्फ़ वह संस्थापक संपादक बने, उसे श्रेष्ठ फ़िल्मी पत्रिका भी बनाया. टाइम्स ऑफ़ इंडिया गु्रप से ही प्रकाशित अंगरेज़ी फ़िल्म पत्रिका फ़िल्म फेयर से कहीं ज़्यादा पूछ तब माधुरी की हुआ करती थी. माया नगरी मुंबई में तब शैलेंद्र और गुलज़ार जैसे गीतकार, किशोर साहू जैसे अभिनेताओं से उन की दोस्ती थी और राज कपूर सरीखे निर्माता-निर्देशकों के दरवाजे़ उन के लिए हमेशा खुले रहते थे. कमलेश्वर खुद मानते थे कि उन का फ़िल्मी दुनिया से परिचय अरविंद कुमार ने कराया. और वह मशहूर पटकथा लेखक हुए. ढेरों फ़िल्में लिखीं. बहुत कम लोग जानते हैं कि अमिताभ बच्चन को फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार के लिए अरविंद कुमार ने ही नामित किया था. न सिर्फ़ इतना बल्कि ख्वाज़ा अहमद अब्बास की फ़िल्म सात हिंदुस्तानी के लिए स्क्रीन टेस्ट में अरविंद कुमार ने ही अमिताभ बच्चन को चुना था. तो ऐसी माया नगरी और ग्लैमर की ऊभ-चूभ में डूबे अरविंद कुमार ने हिंदी थिसारस तैयार करने के लिए 1978 में 16 साल की माधुरी की संपादकी की नौकरी छोड़ दी. मंुबई छोड़ दी. चले आए दिल्ली. लेकिन जल्दी ही आर्थिक तंगी ने मजबूर किया और खुशवंत सिंह की सलाह पर अंतरराष्ट्रीय पत्रिका रीडर्स डाइजेस्ट के हिंदी संस्करण सर्वोत्तम रीडर्स डाइजेस्ट के संस्थापक संपादक हुए. जब सर्वोत्तम निकलती थी तब अंगरेज़ी के रीडर्स डाइजेस्ट से ज़्यादा धूम उस की थी.

    लेकिन थिसारस के काम में फिर बाधा आ गई. अंततः सर्वोत्तम छोड़ दिया. अब आर्थिक तंगी की भी दिक्कत नहीं थी. डॉक्टर बेटा सुमीत अपने पांव पर खड़ा था और बेटी मीता लाल दिल्ली के इरविन कॉलेज में पढ़ाने लगी थी. अरविंद कुमार कहते हैं कि थिसारस हमारे कंधे पर बैताल की तरह सवार था, पूरा तो इसे करना ही था. बाधाएं बहुत आईं. एक बार दिल्ली के मॉडल टाउन में बाढ़ आई. पानी घर में घुस आया. थिसारस के लिए संग्रहित शब्दों के कार्डों को टांड़ पर रख कर बचाया गया. बाद में बेटे सुमीत ने अरविंद कुमार के लिए न सिर्फ़ कंप्यूटर ख़रीदा बल्कि एक कंप्यूटर ऑपरेटर भी नौकरी पर रख दिया. डाटा इंट्री के लिए. थिसारस का काम निकल पड़ा. काम फ़ाइनल होने को ही था कि ठीक छपने के पहले कंप्यूटर की हार्ड डिस्क ख़राब हो गई. लेकिन गनीमत कि डाटा बेस फ्लापी में कॉपी कर लिए गए थे. मेहनत बच गई. और अब न सिर्फ़ थिसारस के रूप में समांतर कोश बल्कि शब्द कोश और थिसारस दोनों ही के रूप में अरविंद सहज समांतर कोश भी हमारे सामने आ गया. हिंदी-अंगरेज़ी थिसारस भी आ गया.

    अरविंद न सिर्फ़ श्रेष्ठ रचते हैं बल्कि विविध भी रचते हैं. विभिन्न देवी-देवताओं के नामों वाली किताब शब्देश्वरी की चर्चा अगर यहां न करें तो ग़लत होगा. गीता का सहज संस्कृत पाठ और सहज अनुवाद भी सहज गीता नाम से अरविंद कुमार ने किया और छपा. शेक्सपियर के जूलियस सीजर का भारतीय काव्य रूपांतरण विक्रम सैंधव नाम से किया. जिसे इब्राहिम अल्काज़ी जैसे निर्देशक ने निर्देशित किया. गरज यह कि अरविंद कुमार निरंतर विविध और श्रेष्ठ रचते रहे हैं. एक समय जब उन्होंने सीता निष्कासन कविता लिखी थी तो पूरे देश में आग लग गई थी. सरिता पत्रिका जिस में यह कविता छपी थी देश भर में जलाई गई. भारी विरोध हुआ. सरिता के संपादक विश्वनाथ और अरविंद कुमार दसियों दिन तक सरिता दफ़्तर से बाहर नहीं निकले. क्यों कि दंगाई बाहर तेजाब लिए खड़े थे. सीता निष्कासन को ले कर मुकदमे भी हुए और आंदोलन भी. लेकिन अरविंद कुमार ने अपने लिखे पर माफी नहीं मांगी. न अदालत से, न समाज से. क्यों कि उन्होंने कुछ ग़लत नहीं लिखा था. एक पुरुष अपनी पत्नी पर कितना संदेह कर सकता है, सीता निष्कासन में राम का सीता के प्रति वही संदेह वर्णित था. तो इस में ग़लत क्या था? फिर इस के सूत्र बाल्मीकी रामायण में पहले से मौजूद थे. अरविंद कुमार जितना जटिल काम अपने हाथ में लेते हैं, निजी जीवन मंे वह उतने ही सरल, उतने ही सहज और उतने ही व्यावहारिक हैं. तो शायद इस लिए भी कि उन का जीवन इतना संघर्षशील रहा है कि कल्पना करना भी मुश्किल होता है कि कैसे यह आदमी इस मुकाम पर पहुंचा. कमलेश्वर अरविंद कुमार को शब्दाचार्य ज़रूर कह गए हैं. और लोग सुन चुके हैं. लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि अमरीका सहित लगभग आधी दुनिया घूम चुके यह अरविंद कुमार जो आज शब्दाचार्य हैं, एक समय बाल श्रमिक भी रहे हैं. हैरत में डालती है उन की यह यात्रा कि जिस दिल्ली प्रेस की पत्रिका सरिता में छपी सीता निष्कासन कविता से वह चर्चा के शिखर पर आए उसी दिल्ली प्रेस में वह बाल श्रमिक रहे.

    वह जब बताते हैं कि लेबर इंस्पेक्टर जांच करने आते थे तो पिछले दरवाज़े से अन्य बाल मज़दूरों के साथ उन्हें कैसे बाहर कर दिया जाता था तो उन की यह यातना समझी जा सकती है. अरविंद उन लोगों को कभी नहीं समझ पाते जो मानवता की रक्षा की ख़ातिर बाल श्रमिकों पर पाबंदी लगाना चाहते हैं. वह पूछते हैं कि अगर बच्चे काम नहीं करेंगे तो वे और उन के घर वाले खाएंगे क्या? वह कहते हैं कि बाल श्रम की समस्या का निदान बच्चों को काम करने से रोकने में नहीं है, बल्कि उन के मां बाप को इतना समर्थ बनाने में है कि वे उन से काम कराने के लिए विवश न हों. तो भी वह बाल मजदूरी करते हुए पढ़ाई भी करते रहे. दिल्ली यूनिवर्सिटी से अंगरेज़ी में एम. ए. किया. और इसी दिल्ली प्रेस में डिस्ट्रीब्यूटर, कंपोजिटर, प्रूफ रीडर, उप संपादक, मुख्य उप संपादक और फिर सहायक संपादक तक की यात्रा अरविंद कुमार ने पूरी की. और कैरवां जैसी अंगरेज़ी पत्रिका भी निकाली. सरिता, मुक्ता, चंपक तो वह देखते ही थे. सचमुच अरविंद कुमार की जीवन यात्रा देख कर मन में न सिर्फ़ रोमांच उपजता है बल्कि आदर भी. तिस पर उन की सरलता, निश्छलता और बच्चों सी अबोधता उन की विद्वता में समुंदर सा इज़ाफा भरती है. यह एक विरल संयोग ही है कि अरविंद उसी मेरठ में जन्मे हैं जहां खड़ी बोली यानी हिंदी जन्मी.


    अरविंद जी से संपर्क करे खातिर
    फोन 09716116106
    आ ईमेल samantarkosh@gmail.com


    दयानंद पांडेय
    5/7 डालीबाग, लखनऊ,
    मोबाइल: 09335233424
    09415130127
    फ़ोन: 0522-2207728
    email : dayanand.pandey@yahoo.com

     
    • Ramendra Mishra 11:46 am on June 19, 2011 Permalink | Reply

      आदरणीय पांडेय जी,
      प्रणाम | आपके इस आलेख को मैं हिंदी की एक धरोहर के रूप में देख रहा हूँ | जितनी बहुमूल्य आपकी सामग्री है उतनी ही बहुमूल्य शैली भी | यदि आपको और अँजोरिया के संपादक जी को कोई आपत्ति न हो तो इस आलेख को मैं अपनी ‘उभरता बिहार’ (मासिक) पत्रिका में प्रकाशित करना चाहूँगा |
      भवन्निष्ठ
      रामेन्द्र मिश्र
      समाचार संपादक,’उभरता बिहार’,पटना
      ramendrarns@gmail.com

      • Co-ordinator 2:27 pm on June 19, 2011 Permalink | Reply

        आदरणीय मिश्रा जी,

        अँजोरिया को कोई आपत्ति नहीं है. पर आप कृपया पाण्डे जी से फोन कर के बात कर लें तो अच्छा रहेगा.

        आपका,
        ओम
        editor@anjoria.com

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