चलना जीवन की कहानी रुकना मौत की निशानी

– दयानंद पांडेय

एक सार्थक और प्रेरक जिंदगी जी है अरविंद कुमार ने

रचनात्मकता आदमी को कैसे युवा बनाए रखती है इस बात को देखना-परखना हो तो अरविंद कुमार से मिलिए. अब जब अरविंद कुमार को हिंदी अकादमी दिल्ली ने शलाका सम्मान से विभूषित किया है तो उन्हें याद आते हैं 1945 से शुरू होते कुछ दिन. जनवरी में वह पंद्रह साल के हुए थे, मैट्रिक की परीक्षा में बैठ चुके थे, अंतिम पर्चा 26 मार्च को हुआ था और पहली अप्रैल से ही सरिता के प्रकाशकों के दिल्ली प्रेस में बतौर कंपोजीटर-डिस्ट्रीब्यूटर काम करने लगे थे. साथ-साथ आजादी की लड़ाई में तरुण सैनिक की तरह दिल्ली के करोल बाग उपनगर में पूरी तरह सक्रिय थे. और कांग्रेस सेवादल के साथ साथ जुझारू लाल किला ग्रुप के सदस्य थे. जिन दिनों महात्मा गांधी नई दिल्ली की भंगी कालोनी (आजकल हरिजन बस्ती) में रहते थे, तो पूरे एक महीने वहां स्वयंसेवक के रूप में उपस्थित रहे थे. आज़ादी के लिए ब्रिटिश सरकार से जो बातचीत चल रही थी, उस पर विचार विमर्श करने के लिए पंडित नेहरू, मौलाना आज़ाद, सरदार पटेल जैसे नेता वहां गांधी जी से मिलने आते-जाते रहते थे.

जीवन का महामंत्र

15 अगस्त को पहले स्वाधीनता दिवस पर लाल किले से पंडित नेहरू का ओजस्वी भाषण सुनने अरविंद कुमार भारी भीड़ में मौजूद थे. पंडित जी ने भारत के प्राचीन गौरव का वर्णन करते भविष्य का जो खाका बुना वह अब तक अरविंद के कानों में गूंजता है. उन के सभी मित्रों के सामने सवाल था आज़ाद हिंदुस्तान में देशभक्ति का मतलब क्या? अरविंद कुमार का मानना था कि अब वही आदमी देशभक्त माना जाना चाहिए जो अपना हर काम मेहनत से, पूरी तनदेही से, ईमानदारी से करे और निजी विकास कर के देश को आगे बढ़ाए. कोरी नारेबाजी को नए दौर में देशभक्ति नहीं कहा जा सकता.बस यह उन्हों ने अपने जीवन का महामंत्र बना लिया. 1948 आते-आते दिन भर प्रेस में नौकरी के बाद शाम के समय आगे की पढ़ाई शुरू कर दी. मैट्रिक में उन्हें चार विषयों में डिस्टिंक्शन मिला था. 1956 तक शाम को चलने वाले पंजाब विश्वविद्यालय के ईविंग कॉलेज से इंग्लिश लिटरेचर में एम.ए. कर लिया. तब तक वह दिल्ली प्रेस में पहले प्रूफ रीडर, फिर उप संपादक सरिता, बाद में उप संपादक (इंग्लिश) कैरेवान बन चुके थे. फिर धीरे-धीरे वहां की सभी पत्रिकाओं के प्रभारी सहायक संपादक बन गए थे.

इसी बीच 1953 में उन का परिचय हुआ इंग्लिश के पहले थिसारस से. ठीक 101 साल पहले लंदन में इस ऐतिहासिक कोश की रचना फ्रांसीसी मूल के वैज्ञानिक और भाषा-प्रेमी रोजेट ने की थी. यह किताब क्या देखी, अरविंद जी दीवाने हो गए. दिन-रात अपने पास रखते, जब-तब पन्ने पलटते, शब्दों के अनमोल भंडार में विचरते, इंग्लिश की शब्दशक्ति बढ़ाते रहते… और सोचते चाहते रहते कि हिंदी में भी कोई ऐसा कोश हो तो क्या हो! वाह हो! हिंदी का भला हो, हिंदी आगे बढ़े, तेजी से बढ़े. 23 साल की उमर के अरविंद यह सोच ही नहीं सकते थे कि इस के 43 साल बाद आज़ादी का पचासवां साल आते-आते उन्हीं के हाथ का बना हिंदी का पहला थिसारस छपेगा और उसकी पहली प्रति वह स्वयं और उन की पत्नी कुसुम भारत के राष्ट्रपति को भेंट करेंगे. अपनी देशभक्ति और हिंदी प्रेम का साकार प्रमाण पेश करेंगे. वह तो बस यही सोचते थे कि भारत सरकार ने हिंदी कोशकारिता के लिए इतने सारे आयोग बनाए हैं. वहां से कभी न कभी हिंदी का थिसारस भी आएगा ही.

लेकिन यहां तक का सफर कोई आसान सफर नहीं था. वह जो सपना था, 1973 के दिसंबर की 26-27 तारीख तक सपना ही बना रहा था. इस बीच वह सरिता कैरेवान छोड़ कर मुंबई (तब बंबई) से टाइम्स आफ इंडिया के लिए फिल्म पत्रिका माधुरी का संपादन करने पहुंच चुके थे (नवंबर 1963). तब वह हिंदी के डाक्टर धर्मवीर भारती, महावीर अधिकारी, चंद्रगुप्त विद्यालंकार और आनंदप्रकाश जैन और इंग्लिश के शामनाथ, डाक्टर रांगणेकर, खुशवंत सिंह और बी.के. करंजिया जैसे संपादकों के बीच टाइम्स संस्थान के सब से कम उम्र के संपादक थे. उन्होंने माधुरी को सस्ती स्टार-क्रेजी फिल्म पत्रकारिता से दूर रखा था, हिंदी में कलात्मक और सुरुचिपूर्ण फिल्मों को प्रोत्साहन देने के लिए समांतर सिनेमा आंदोलन की मुखपत्रिका बना दिया.

माधुरी के संपादन के आरंभिक काल में ही उन्हें गीतकार शैलेंद्र, निर्माता-निर्देशक राज कपूर, देव आनंद, बी. आर. चोपड़ा, शक्ति सामंत, मृणाल सेन, संगीतकार नौशाद, खय्याम, जयदेव, शंकर जयकिशन जैसे दिग्गजों से फिल्म कला के बारे में जानने को बहुत कुछ मिला. लेकिन 1973 तक आते-आते उन्हें लगने लगा था कि वह कोरे फिल्म पत्रकार बनने के लिए नहीं जनमे हैं. उन्हें तो अपना कुछ ऐसा करना है जिस के लिए वह पैदा हुए हैं, जो उन का अपना निजी सपना हो.

सपना तेरा है तू ही साकार कर

तभी दिसंबर 26-27 की रात उन्हें याद आया वह रोजेट का थिसारस और उस जैसी कोई किताब हिंदी में होने की आकांक्षा. तब रात के अंधेरे में किसी ने उन से कहा, “सपना तेरा था, तो कोई दूसरा क्यों साकार करेगा. तुझे ही यह करना है, तू ही हिंदी को थिसारस दे.” और 27 की सुबह हैंगिंग गार्डन में सैर के समय अरविंद और कुसुम ने तय कर लिया कि वही यह कोश बनाएंगे. कहीं से कैसी भी आर्थिक सहायता की संभावना नहीं थी. तय किया कि फिलहाल शाम के सुबह और समय मुंबई में ही घर पर काम करें, किफायती जीवन जी कर बचत बढ़ाएं और 1978 की मई तक माधुरी छोड़ कर दिल्ली अपने घर चले जाएं. उस दिन से जीवन को नई राह मिल गई.

1978 में वह मुंबई फिल्म पत्रकारिता में शीर्ष पर थे. मायानगरी की मोहमाया छोड़ कर दिल्ली चले आए. पर मुसीबतें तो अभी शुरू होनी थीं. सितंबर में माडल टाउन को यमुना की बाढ़ ने घेर लिया. मुंबई से लाया सब साज सामान पानी की भेंट चढ़ गया. कुछ बचा तो बचे थे समांतर कोश के कार्ड… भूत काल बहा ले गई थी, यमुना भविष्य को सुरक्षित छोड़ गई थी.

तभी दूसरी मुसीबत आई. पिताजी ने बाढ़ से परेशान हो कर वह मकान सस्ते में बेच दिया. अब गाजियाबाद के सूर्यनगर-चंद्रनगर इलाके में आए. जो बचत थी वह सब हवा हो गई. रीडर्स डाइजेस्ट का हिंदी संस्करण सर्वोत्तम निकालने की जिम्मेदारी लेनी पड़ी. लेकिन वहां कुल पांच साल (1980-1985) काम किया. आर्थिक दशा कामचलाऊ होते ही सर्वोत्तम छोड़ दिया और समांतर कोश के काम में पूरी तरह लग गए.

और तब 1989 में दिल का भारी दौरा पड़ा. सफल आपरेशन हुआ. कुछ दिन बाद ही जांडिस ने घेर लिया. उस से निकल कर फिर पति-पत्नी दिन रात समांतर कोश पर काम करने लगे. बेटे डॉक्टर सुमीत ने सुझाव दिया और इस के लिए आर्थिक संसाधन जुटाए कि सारा काम कंप्यूटर पर किया जाए. 63 साल के अरविंद ने कंप्यूटर पर काम शुरू किया. पुराना डाटा किसी से फीड करवाया. नया डाटा अपने आप जोड़ा.

जो काम कुल दो साल में पूरा करने का अनुमान था, वह बड़ी जद्दोजहद के बाद 23 साल बाद 1996 में पूरा हुआ. और नेशनल बुक ट्रस्ट ने स्वाधीनता के पचासवें वर्ष की पुस्तकों में सम्मिलित करते हुए प्रकाशित किया.

पर अरविंद का काम अभी खत्म नहीं हुआ था. अब उस डाटा में इंग्लिश डालने की धुन सवार हुई. दस साल की मेहनत के बाद स्वाधीनता के साठवें वर्ष में विश्व का तीन खंडों वाला विशालतम द्विभाषी थिसारस द पेंगुइन इंग्लिश-हिंदी-हिंदी-इंग्लिश थिसारस ऐंड डिक्शनरी प्रकाशित हुआ.

और अब अरविंद कुमार ने 1947 के देशभक्ति के अपने मूल मंत्र का पालन करते हुए बनाया है इंटरनेट पर जारी होने वाला अनोखा अरविंद लैक्सिकन. लैक्सिकन के विशाल शब्द महा सागर में 9,00,000 से ज़्यादा इंग्लिश और हिंदी अभिव्यक्तियां हैं. माउस से क्लिक कीजिए – पूरा रत्नभंडार खुल जाएगा… उदाहरण के लिए सुंदर शब्द के इंग्लिश में 200 से और हिंदी में 500 से ज़्यादा पर्याय हैं. यह 15 अगस्त 2011 से राष्ट्र ही नहीं दुनिया भर के भाषा-प्रेमियों को उपलब्ध होगा.

इस के बाद अरविंद निष्क्रिय बैठने वाले नहीं हैं. अब वह इस में तमिल और चीनी भाषाएँ जोड़ने की योजना बना रहे हैं. उन का कहना है चलना जीवन की कहानी रुकना मौत की निशानी.

चित्र परिचय – तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. शंकर दयाल शर्मा को समांतर कोश की पहली प्रति भेंट करते अरविंद कुमार दंपति. 13 दिसंबर 1996. यह अरविंद कुमार की पहली प्रकाशित पुस्तक थी. तब अरविंद 66वां वर्ष पूरा कर रहे थे.


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दयानंद पांडेय
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