चलीं, भोजपुरिओ में नेवता लिखल जाव

Ram Raksha Mishra Vimal

अब लागऽता हर भोजपुरिहा बुद्धिजीवी एह बात के माने लागल बाड़े कि भोजपुरिहा अपना भाषा का प्रति काफी संकोची होले. एह संकोच का पीछे कवनो विधेयात्मक सोच कम ,हीन बोध ज्यादा बा. जो केहू जान जाई कि ई भोजपुरी बोलेले त मानि ली कि अनपढ़ हवे. कारन चाहे जवन भी होखे बाकिर साँच त इहे बा. बाहर भीतर निकले-पइसेवाला आदमी रोज ब रोज ई देख रहल बा. गैरभोजपुरी खास कर गैरहिंदीभाषीक्षेत्र में एकर सच्चाई नीमन से लउकेले.

कुछ दिन पहिले आरा गइल रहीं.एगो रिक्शा प बइठले एक आदमी के इंतजार करत रहीं.रिक्शावाला कवनो शब्द के सही वर्तनी पुछलसि. हम ओकरा के दू गो वर्तनी बतवलीं एगो हिंदी आ एगो भोजपुरी खातिर.ऊ हिंदी वर्तनी पर त मूड़ी हिला लिहलसि बाकिर भोजपुरीवाली बात पर अचंभा में परि गइल. भोजपुरियो में लिखाला का? एगो अजीब मुद्रा में हमरा ओरि ताकिके ऊ पुछलसि.

ई प्रश्न भोजपुरी भाषा आ साहित्य के प्रचार प्रसार के पोल खोले खातिर काफी बा. खाली कुछ लघु पत्रिका निकालि लिहला आ नेट पर पढ़ि-लिखि लिहला से भोजपुरी  मानसिकता में अपेक्षित बदलाव संभव नइखे. एकरा खातिर सामाजिक संस्थानन के विशेष जागरूकता अभियान चलावे के परी. हमनी के अपना हर आमंत्रण पत्र,पोस्टर आदि में हिंदी का सङही भोजपुरी में भी लिखे शुरू करेके परी. पहिले लोगन के ई त लागो कि भोजपुरी में लिखला में गँवारूपन नइखे,अपना भाषा का प्रति प्यार आ सम्मान बा. ई पहल पहिले हर जागरूक बनाम बुद्धिजीवी भोजपुरिहा के करेके परी. फेरु जब धीरे धीरे ई फइल जाई त कवनो भाषण के जरूरत ना परी.

अपना सभ भोजपुरिहा भाई बहिन लोग से हम ई निहोरा कइल चाहबि कि अपना हर आमंत्रण पत्र,पोस्टर आदि में भोजपुरी के भी इस्तेमाल करीं. तबे अपना संस्कृति के कुछ जरूरी थातिन के बचावल जा सकऽता, आ अपना माटी के भाषा के गर्व के भाषा बनावल जासकऽता. चलीं, भोजपुरिओ में नेवता लिखल जाव.